• Abhishek meena

मेसोपोटामिया से लेकर भारतीय प्रायद्वीप की सांस्कृतिक विरासत है, साफा।

Updated: Jun 12, 2020

सर को ढकने और उसपर पहने जाने वाला साफा जो लोगो के सांस्कृतिक और धार्मिक दोनों पहलुओ का वर्णन करता है। विश्व के अलग-अलग भागो मे इसे भिन्न नामो से जाना जाता है और भिन्न कारणो से पहना जाता है।

हाल ही मे एक सोशल मीडिया साइट ट्विटर पर राजस्थान के पर्यटन मंत्री श्री विश्वेन्द्र सिंह ने एक ट्वीट किया #safawithtwitter हैशटैग के साथ ताकि लोगो को प्रोत्साहित कर सके इस सांस्कृतिक पहनावे के साथ अपने अनुभवो को साझा करने के लिए। उनके इस ट्वीट ने पूर्व योजना के अनुरूप काम किया भी और इसके बाद कई राजनीतिक दिग्गजों और कलाकारो सचिन पायलेट,गजेंद्र सिंह शेखावत,अशोक चाँदना, मुरारी लाल मीणा, सतीश पूनीया, शेखावत ने इसका अनुसरण किया।


अभी कोविड-19 महामारी ने राजस्थान के पर्यटन को काफी प्रभावित किया है और नुकसान पहुचाया है ऐसे मे इस अभियान ने डिजिटल प्लेटफॉर्म पे पर्यटन के लिए एक संजीवनी की तरह काम किया है। लोगो ने भी राजनीति से दूर हटते हुए इसमे अपनी पूर्ण सहभागिता दिखाई है

पर्यटन मंत्री कुँवर विश्वेन्द्र सिंह ।


उत्पत्ति

वैसे तो पगड़ी की उत्पत्ति का सटीक प्रमाण अभी तक पता नहीं है, परंतु पुराने इतिहास की उधेड्बुन से यह पता चलता है की कभी न कभी ये हिन्दू, मुस्लिम,ईसाई और यहूदियो मतलब की लगभग सभी धर्मो के लोगो द्वारा पहने जाने वाला वस्त्र था। अभी तक ज्ञात प्रमाणो मे से एक 2350 ईसा पूर्व के एक शाही मेसोपोटामिया (तिगरिस और युप्रटूस नदी के किनारे बसा हुआ एक शहर, आज का इराक और कुवैत) की मूर्ति पर पगड़ी जैसा एक आभूषण देखा गया जो की सबसे पुराना ज्ञात प्रमाण है पगड़ी का। इसका मतलब पगड़ी का इतिहास अब्राहमिक धर्मो (यहूदी,इस्लाम,ईसाई) के इतिहास से भी पुराना है।


पगड़ी का उपयोग हिंदुस्तान,मध्य पूर्व और अफ्रीका मे धूप,बारिश और सर्दी से बचाव के लिए किया जाता था। कुछ जगह पर यह धार्मिक अनुयायियों को गैर अनुयाई लोगो से अलग करने के लिए भी किया जाता था, या फिर दोनों तरीके के लोगो के लिए अलग अलग रंग की पगड़ी पहनी जाती थी। जैसे की पहले सिरिया और मिश्र मे ईसाई धर्म के अनुयाइ नीली पगड़ी पहनते थे, मुस्लिम लोग सफ़ेद, यहूदी लोग पीली पगड़ी पहनते थे।


1699 मे गुरु गोबिन्द सिंह जी के भाषण के बाद खालसा परंपरा की शुरुआत हुई और बालो की प्राकृतिक बढ़ोतरी को कभी नहीं छेडने का निर्णय लिया। अब जब बालो को काटा नहीं जा सकता था तो उनकी सुरक्षा और उनको सुव्यवस्थित रखने के लिए पग पहनना शुरू किया गया, हालांकि शुरुआती दिनो मे इसका कारण गुरु के अनुयायियों को बाकी सबसे अलग दिखना भी एक इसके पहनने का कारण था, दूसरा ये की पग से सर पर लगने वाली लाठी की चोटो और तलवार की तीखी धार से भी बचाव मे मदद होती थी।

मौर्य साम्राज्य,गुर्जर प्रतिहार वंश जैसे पुराने राजवंशो से प्राप्त प्रमाणो से भी पगड़ी के उपयोग का पता चलता है



गुरु गोबिन्द सिंह


पहचान और नाम –

बात जब भारतीय प्रायद्वीप की हो तो पता चलता है की सिर्फ एक ही देश मे पगड़ी को अनेक नामो से जाना जाता है। उत्तर भारत के पंजाब और हरियाणा मे इसे पग या दस्तर, राजस्थान के अधिकांश हिस्से मे पगड़ी, पश्चिमी राजस्थान मे साफा, पूर्वी राजस्थान और महाराष्ट्र मे फेंटा, मैसूर मे पेटा, मिथिला और बिहार मे पाग इत्यादि नामो से जाना जाता है।

पगड़ी का रंग,उसका माप और पहनने का तरीका लोगो की जातियो, लोगो के सामाजिक वर्ग और उनके पेशे से जुड़ा हुआ था।

पुरानी बॉलीवुड की फिल्मों की तरह अगर कोई व्यक्ति अपनी पगड़ी खोल के किसी दूसरे के चरणों मे रख दे तो उसे निवेदन की तरह देखा जाता है और यदि कोई किसी दूसरे की पगड़ी के ऊपर पैर रख दे तो उसे अपमान की तरह देखा जाता है। इससे ये साफ पता चलता है की पगड़ी लोगो की गरिमा और मर्यादा का प्रतीक रही है। पगड़ी शादी ब्याह मे दूल्हे के साज शृंगार के वस्त्रो मे से एक महत्वपूर्ण वस्त्र है, बिना इसके वर के श्रृंगारको पूर्ण नहीं माना जाता।


मराठी फेटा पहने हुए एक युवती



पगड़ी और किस्सा सियासत का –

बात है राजस्थान के 2013 मे हुए विधानसभा चुनावो के बाद की, ये साल काँग्रेस के लिए बहुत बुरा गुजरा था। मोदी जी की लहर और सूबे मे उठ रही विरोधी लहरों के बीच काँग्रेस 200 मे से महज 21 सीटो पर सिमट गयी थी। उस वक़्त केंद्र मे भी पार्टी का बुरा हाल हुआ, ऐसे मे सचिन पायलट ने सूबे मे काँग्रेस की सत्ता अपने हाथ मे ली और पार्टी को अगले चुनावो मे ऐसे हालातो से बचाने के लिए मेहनत की और “मेरा बूथ,मेरा गौरव” जैसे अभियान चलाये। इसी अभियान के दौरान जब कई जगह कार्यकर्ताओ ने उन्हे साफा पहनाना चाहा तो उन्होने 5 दिसम्बर को ये खुलासा किया की मैंने 2014 मे ये प्रण लिया था की जब तक सूबे मे हमारी सरकार नहीं बन जाती मे अपने सर पे पगड़ी नहीं पहनुंगा और हुआ भी ऐसा ही। 11 दिसम्बर 2018 को आए परिणाम के साथ ही साफ हो गया की उनकी मेहनत और प्रण दोनों रंग लाये। मतलब साफ ज़ाहिर है की लोग पगड़ी को अपने आत्मसम्मान से प्राय: जोड़ते है।

2018 चुनावो के बाद, उपमुख्यमंत्री पद की सपथ लेते हुए सचिन पायलेट।


क्या पगड़ी पुरुष प्रधान समाज का द्योतक है ?

पगड़ी को सिर्फ पुरुषो का ही पहनने का वस्त्र बता देना अपने आप मे एक अधूरी जानकारी होगी। महाराष्ट्र मे औरते काफी बढ़ चढ़कर फेटा पहनती है। सिख धर्म मे भी काफी संख्या मे औरते पगड़ी पहनती है, क्योकि उनके अनुसार गुरु गोबिन्द सिंह जी ने सभी सिख अनुयायियों को पहनने के लिए कहा था बिना किसी लिंग भेद के। इतिहास के अनुसार पगड़ी पहनने मे किसी भी तरह का लिंगभेद जैसा कुछ था नहीं, परंतु धीरे धीरे पगड़ी घर के मुखिया के रूप मे देखि जाने लगी और हिन्दू धर्म मे जब कोई घर के मुखिया यानि पिता की म्रत्यु होती है तो उसकी मौत के 12 दिन बाद उसके बड़े बेटे को घर का मुखिया बनाया जाता है और उसे लोगो,सगे-सम्बन्धियो द्वारा सफ़ेद रंग की पगड़ी पहनाई जाती है। सफ़ेद रंग शोक का प्रतीक है तो सिर्फ सफ़ेद रंग की ही पगड़ी पहनाई जाती है। प्राय गाँव देहात मे घरो के मुखिया पुरुष लोग ही होते थे तो लोगो ने पागड़ी को सिर्फ पुरुषो से जोड़ना शुरू कर दिया लेकिन इस आधुनिक युग मे अब लोग अपनी बड़ी बेटी को भी पागड़ी पहनाते हुए देखे जा सकते है।


Source:-

1. https://www.news18.com/news/politics/why-sachin-pilot-refused-to-wear-the-traditional-turban-while-campaigning-in-rajasthan-1963051.html

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