• Arjun Mehar

आखिर जेएनयू छात्र राजनीति के मामलें में अन्य विश्वविद्यालयों से अलग क्यों है?


"ये हैं कॉमरेड गीता कुमारी, हमारे जेएनयू की भूतपूर्व अध्यक्ष, जो अपने खेतों में चारा काट रही हैं और साथ में गोबर से छाणे (कंडे) थाप रही है.

अगर इन तस्वीरों से आपके मन-मस्तिष्क में बनी "दबंग" छात्रनेता की छवि को ठेस पहुंची हो तो माफ़ी चाहूंगी, लेकिन हमारे जेएनयू की राजनीति यही है. इससे एक किस्सा याद आया.


पिछली सर्दियों में राजस्थान विश्वविद्यालय के एक "बड़े" और "प्रसिद्ध" छात्रनेता जेएनयू आये हुए थे. उनसे जेएनयू के साबरमती ढाबे के बेढंगे पत्थरों पर बैठकर बातचीत चल रही थी. उनके हाव भाव साफ़ दिखा रहे थे कि उन्हें न तो साबरमती की चाय का स्वाद समझ आ रहा था और ना ही यहाँ की राजनीति. जेएनयू छात्र संघ के पदाधिकारी भी वहीं बैठे थे. हमारे राजस्थान यूनिवर्सिटी वाले नेताजी को हजम ही नहीं हो रहा था कि छात्र राजनीति के गढ़ जेएनयू में ऐसे "छात्रनेता" भी हो सकते हैं. हमारे कॉमरेड के साइड में टंगे झोले के सामने  "नेताजी" की स्कार्पियो की चमक फीकी पड़ गयी. जो कमी रह गयी थी, वो जेएनयू छात्रसंघ कार्यालय के दर्शन के बाद पूरी हो गयी. "नेताजी" सोच रहे होंगे कि भला इस चार टूटी-फूटी कुर्सियों, एक पुराने टेलीविज़न और दीवार पर टंगी कुछ क्रांतिकारियों की तस्वीरों, जिनके फ्रेम अब कुछ पुराने हो चुके हैं; वाले कमरे को कैसे छात्रसंघ कार्यालय माना जाए? "नेताजी" के हाव भाव उनके भीतर के कोलाहल को बयां कर रहे थे और इधर हमारे कॉमरेड पर्चा लिखने में मशगूल थे. बड़ी बहस चल रही थी. एक-एक शब्द को बड़ा विचार करने के बाद कागज़ पर उतरा जा रहा था. हमारे "बड़े नेताजी" की सिट्टी पिट्टी लगभग गुम ही हो चुकी थी. उन्हें अंततः अपनी स्कार्पियो में बैठकर एसी की हवा खाने के बाद ही शायद कुछ-कुछ समझ आया होगा! 



खैर, यह किस्सा यह बताने के लिए सुनाया गया है कि आम जनमानस जिसे छात्र राजनीति समझता है और इस छात्र राजनीति के नाम पर आम आँखों को जिस तरह के दृश्य देखने और बातें सुनने की आदत है, वो असल में छात्र राजनीति नहीं है. मैंने राजस्थान विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव भी देखे हैं. एक छात्रनेता लाखों रूपए खर्च करता है और कभी-कभी करोड़ों भी. चुनाव के अगले दिन अखबारों में अलग अलग प्रत्याशियों की तस्वीरें छपी होती हैं, जिनमें वो सड़क पर लेट कर और हाथ जोड़कर लोगों से वोट मांग रहे होते हैं. यहाँ तक कि "वोटों की राखी" भाई-बहिन का रिश्ता भी स्थापित कर देती है.



हमारे यहाँ जेएनयू में क्या होता है?


हमारे साथी पसीने में तरबतर हर दिन ढाबों और होस्टलों में अपनी डफलियों और पर्चों के साथ कैंपेन करते हैं, प्रेसिडेन्शिअल डिबेट के लिए रात -रात भर मेहनत करते है, इस डर और हिचक के साथ स्टेज पर चढ़ते हैं कि पता नहीं सामने वाले कैंडिडेट या ऑडियंस की तरफ से क्या सवाल आ जाये? यहाँ चंदों पर इलेक्शन लड़े जाते हैं. जब दिल्ली में कहीं धरना देने जाना होता है तो बस में सभी लोगों के पास डफली सिर्फ इसलिए पहुंचाई जाती है कि बस का किराया निकल आये. यहाँ जीतने के बाद राजस्थान यूनिवर्सिटी की तरह हर छात्रसंघ अध्यक्ष अपना फर्नीचर और गाडी साथ लेकर नहीं आता हैं. हमारे यहाँ नेता होने की एक योग्यता यह भी है कि वो इतने बड़े कैंपस में आपको खुला घूमता और लोगों से हालचाल पूछता मिले. अगर दो दिन भी अध्यक्ष कैंपस से बाहर रहा तो पीछे से सब गरियाना शुरू कर देते हैं. यही हमारी लिगेसी है और यही छात्र राजनीति.

जेएनयू के नेताओं पे अक्सर हवा-हवाई होने का आरोप भी लगाया जाता है. कहा जाता है कि टैक्स पेयर के पैसे पर पलने वाले यह लोग किस मुंह से किसानों और मजदूरों की बात करते हैं? मैंने बहुत से छात्र नेता देखे हैं जो "किसान-पुत्र" होने के नाम पर वोट मांगते हैं और चुनाव भी जीतते हैं; लेकिन उसके बाद उनके मुंह से किसान का नाम तक कभी सुनाई नहीं देता.


ये हमारी कॉमरेड हैं. किसान परिवार से हैं, और किसानों की बात भी करती हैं. जे.एन.यू. में पीएचडी कर रही हैं. स्टूडेंट पॉलिटिक्स में सक्रिय हैं और छात्र संघ की अध्यक्ष रह चुकी हैं. बहुत बेहतरीन नारे लगाती हैं और इनसे बात करने का तो पूछिए ही मत. आप जब चाहें इनके साथ चाय पी सकते हैं, यह कभी मना नहीं करेंगी. यह हमारी नेता हैं. यह जेएनयू की नेता हैं. और यही जेएनयू है. आज कॉमरेड गीता ने अपने व्हाट्सअप स्टेटस पर यह तस्वीरें डाल रखी थी, सोचा क्यों न जेएनयू के "देशद्रोही" और "हवा-हवाई" छात्रों से आपको रुबरु कराया जाए.

इस बार आप जब भी अपने विश्वविद्यालयों में जाएँ तो आस-पास नज़र ज़रूर दौड़ाईयेगा; आँखों पर रे-बेन लगाए, बड़ी सी गाड़ियों पर चढ़कर, फूल-मालाओं के बोझ तले दबे और सैकड़ों गाड़ियों के हुजूम के बीच खड़े छात्र नेताओं की भीड़ में भी आपको ज़रूर कई गीता कुमारी और आइशी घोष मिलेंगी!




यह लेख खुशबू शर्मा ने लिखा है. ये राजस्थान के सीकर जिले से है और वर्तमान में जेएनयू के Political Science विभाग में अध्ययनरत है.




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