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चीन के रास्ते पे चलने की ओर अग्रसर भारत

चीन पूरी दुनिया की फैक्ट्री कहा जाता है और इसका है कारन है सस्ते मजदूर। चीन में अगर 30 करोड़ माध्यम वर्ग को छोड़ दिया जाए तो आज भी 100 करोड़ से अधिक लोग गरीबी के स्तर पे रहते है, बेरोजगार है और यही लोग चीन को दुनिया की फैक्ट्री बनाये हुए है।चीन ने एक रणनीति के तहत अपने मजदूरों पे कण्ट्रोल रखता है जिससे किसी भी कंपनी को कभी मजदूरों की बजह से प्रॉब्लम नहीं होती है। चीन में सिर्फ एक ही मजदूर यूनियन है और वो ही कम्युनिटी पार्टी के अंतर्गत आती है। चीन अपने श्रमिकों के लिए कामगार का मुआवजा बीमा प्रदान नहीं करता है, इसलिए काम पर चोट करने वाले श्रमिकों को कोई मुआवजा भी नहीं मिलता है और इन्ही सस्ते श्रमिकों के दम पे चीन डंपिंगनिति अपनाके दुसरो देशो में उनके देश की कंपनी से सस्ता माल उपलब्ध करवा पता है। भारत में श्रमिक नियम न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948, कारखानों का अधिनियम, 1948, मातृत्व लाभ अधिनियम1961, बोनस अधिनियम का भुगतान1965 ये भारत में महत्वपूर्ण श्रम कानून हैं। इन कानूनों में भारत में संगठित और असंगठित क्षेत्रों के श्रमिकों के हितों को सुरक्षित रखने के लिए कई प्रावधान हैं। श्रम भारतीय संविधान की समवर्ती सूची में आता है। श्रमिक नियमो में बदलाव


कोरोना के इस टाइम में केंद्र और राज्य सरकारों ने काफी कठिन निर्णय लेते हुए लगभग सभी श्रमिक कानूनों में लचीलापन ला दिया है

उत्तर प्रदेश काफी राज्यों ने अपनी मजदूर कानून /श्रमिक कानून में बदलाव किये है लेकिन सबसे ज्यादा जिस बदलाव उत्तर प्रदेश में हुए है ।योगी आदित्यनाथ सरकार ने अगले तीन वर्षों के लिए राज्य में लगभग लगभग सभी प्रकार के श्रमिन कानून ख़त्म कर दिए है। तीन कानूनों और एक प्रावधान जो ससपेंड नहीं हुए है वो ये है

  1. बंधुआ मजदूरी नहीं करवाई जाए

  2. किसी मजदूर को अगर काम की बजह से कोई बीमारी हो जाती है या कोई अक्षमता आ जाती है तो उसके प्रति सहानुभूति रखते थोड़ा कम्पनसेशन दिया जाये

  3. समय से भुगतान हो

इन तीन नियमो के आलावा सभी प्रकार के श्रमिक नियम ससपेंड कर दिए गए है

मध्य प्रदेश

सीएम शिवराज सिंह चौहान ने 72 घंटे तक के ओवरटाइम और कारखानों में काम करने की शिफ्ट की अवधि को 8 घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे करने की अनुमति दे दी है ।50 से कम श्रमिकों और छोटे और मध्यम उद्यमों में कार्यरत फर्मों में कोई निरीक्षण नहीं होगा, निरीक्षण केवल श्रम आयुक्त की अनुमति से या शिकायत के मामले में ही होगा।

राजस्थान

राजस्थान ने मजदूरों के लिए काम के घंटे को 8 घंटे प्रति दिन से बढ़ाकर 12 घंटे प्रति दिन करने के अलावा ले-ऑफ और छंटनी प्रक्रिया में लचीलापन दिखाया है । राजस्थान में अब ट्रेड यूनियन बनाने की शर्त को कड़ी करते हुए बेसिक थ्रेशोल्ड सदस्यता 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 30 प्रतिशत कर दी है

महाराष्ट्र, केरल, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और गुजरात में भी इसी तर्ज पे काफी श्रमिक कानूनों को लचीला बनाया गया है


मजदूर ट्रेड यूनियन मजदूर यूनियन इसे बस कोरोना संकट मान कर शांत बैठे हुए है की कोरोनोवायरस संकट के समय उन्हें सरकार का साथ देना चाहिए।हलाकि मजदूर संघटनो के कुछ मांगे भी उठाई है जैसे की प्रवासी श्रमिकों का एक राष्ट्रीय रजिस्टर बनाना चाहिए जिससे मजदूर को एक उचित पहचान, पोर्टेबिलिटी, श्रम कानून संरक्षण और सामाजिक सुरक्षा जैसे लाभ मिल सके

कुछ मजदूर संघटनो ने राष्ट्रीय प्रवासी श्रमिक नीति तैयार करने का भी सुझाव रखा है . मजदूर यूनियन के सुझाव और राज्यों द्वारा उठाये गए इन कदमो का, मोदी सरकार राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक श्रम सुधार को आगे बढ़ाने के एक अवसर के रूप में भी उपयोग करेगी

बिज़नेस कम्युनिटी रिएक्शन


भारत की व्यवसाइयों और प्रवासी भारतीयों ने इसे एक अच्छा स्टेप बताया है ।भारत की शक्ति सस्ते श्रमिक और अच्छे उत्पादन वाले कारखाने है लेकिन कठिन श्रमिक कानून की बजह से भारत ग्लोबल लेवल पे कभी अपनी युवाशक्ति का फायदा नहीं उठा पाया।कुछ लोग तो यहाँ तक कह रहे है की भारत ने लचीले श्रम बाजार के बजाय बेरोजगारी का विकल्प चुना जिससे देश को काफी नुकसान हुआ। चीन ने अपनी एक रणनीति के तहत मजदूर नियमो में ढील देके पुरे मार्किट को चुरा लिया और दुनिया का कारखाना बन गया और 600 मिलियन से अधिक लोगों को गरीबी से बाहर निकाला। शायद अभी भी बहुत देर नहीं हुई है क्योंकि चीन अधिक महंगा हो गया है और व्यापार करने के लिए एक कठिन जगह भी है। भारत अगर अपनी श्रमिक नियमो में लचीलापन लाता है तो कोरोना के बाद दुनिया की नयी फैक्ट्री के रूप में खुद को स्थापित कर सकता है

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