• Arjun Mehar

EIA 2020 क्या है और इसे लेकर इतना विवाद क्यों मचा हुआ है?

Updated: Aug 6, 2020




हाल ही में, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) अधिसूचना 2020 का मसौदा तैयार किया है, जो वर्तमान अधिसूचना को बदलने का प्रयास करता है.



ईआईए क्या है?


किसी भी प्रस्तावित परियोजना के संभावित पर्यावरणीय प्रभाव के मूल्यांकन के लिए ईआईए एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है. यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके तहत किसी भी विकास परियोजना या गतिविधि को अंतिम मंजूरी देने के लिए लोगों के विचारों पर ध्यान दिया जाता है. ईआईए मूल रूप से यह निर्णय लेने का उपकरण है कि परियोजना को मंजूरी दी जानी चाहिए या नहीं?


पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत केंद्र सरकार में निहित शक्तियों के तहत मसौदा अधिसूचना जारी की जाती है, ताकि पर्यावरण की गुणवत्ता की रक्षा और सुधार के लिए ऐसे सभी उपाय किए जा सकें. 1994 ईआईए अधिसूचना को 2006 में संशोधित मसौदे के साथ बदल दिया गया था. वर्तमान में केंद्र सरकार द्वारा 2006 से जारी संशोधनों और प्रासंगिक न्यायालयों के आदेशों को सम्मिलित करने और ईआईए की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और तेज बनाने के उद्देश्य से इसे पुनः संशोधित करने का विचार किया जा रहा है. सरकार के अनुसार, ऑनलाइन प्रणाली के क्रियान्वयन, प्रक्रिया के अधिक प्रतिनिधिमंडल, युक्तिकरण और मानकीकरण द्वारा प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और समीचीन (Accurate) बनाने के लिए नई अधिसूचना लाई जा रही है. हालांकि, पर्यावरणविदों ने कहा है कि वर्तमान मसौदा ईआईए प्रक्रिया को और कमजोर करेगा.



ईआईए की आवश्यकता क्यों ?


विकास का उद्देश्य सकारात्मक परिवर्तन लाना होना चाहिए लेकिन भारत में विकास के नाम पर पर्यावरण का दोहन जारी है. हर मानवविज्ञानी गतिविधि का पर्यावरण पर कुछ प्रभाव पड़ता है और अक्सर सकारात्मक वातावरण की तुलना में पर्यावरण पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. इसलिए पर्यावरणीय चिंताओं के साथ विकास गतिविधियों को सामंजस्य बनाने की आवश्यकता है. ईआईए प्रक्रिया पारदर्शिता और सार्वजनिक भागीदारी को बढ़ावा देकर समग्र निर्णय लेने की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक भूमिका भी निभाती है. प्रतिकूल प्रभावों से बचने और दीर्घकालिक लाभ सुनिश्चित करने की आवश्यकता ने स्थिरता की इस अवधारणा को जन्म दिया.



ईआईए का उद्देश्य क्या है?


1. विकास गतिविधियों के आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव की पहचान, भविष्यवाणी और मूल्यांकन करना.

2. निर्णय लेने के लिए पर्यावरणीय परिणामों की जानकारी प्रदान करना और उचित विकल्पों और शमन उपायों की पहचान के माध्यम से पर्यावरणीय रूप से ध्वनि और सतत विकास को बढ़ावा देना.



EIA,2020 के साथ में प्रमुख मुद्दे व समस्याएं क्या हैं?


किसी भी संवैधानिक लोकतंत्र में सरकार को ऐसे कानूनों पर जनता की राय लेनी होती है, जिससे बड़ी संख्या में लोगों के प्रभावित होने की संभावना होती है और कानून के प्रावधानों में उन्हें भागीदार बनाना होना होता है. पर्यावरण को लेकर ये नई अधिसूचना लोगों के इस अधिकार को छीनता है और पर्यावरण को बचाने में लोगों की भूमिका का दायरा बहुत कम करती है. वहीं दूसरी तरफ इसमें सरकार की फैसले लेने की विवेकाधीन शक्तियों को और बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया है.


वर्ष 2020 का मसौदा "ईआईए प्रक्रिया" पर राजनीतिक एवं नौकरशाही लोगों के हस्तक्षेप के खिलाफ कोई उपाय नहीं करता है और न ही उद्योगों के लिये. इसके बजाय, यह पर्यावरण की सुरक्षा में सार्वजनिक सहभागिता को सीमित करते हुए सरकार की विवेकाधीन शक्ति का बढ़ाया जाना प्रस्तावित करता है.


राष्ट्रीय रक्षा और सुरक्षा से जुड़ीं परियोजनाओं को वैसे ही रणनीतिक माना जाता है, हालांकि सरकार अब इस अधिसूचना के जरिये अन्य परियोजनाओं के लिए भी ‘रणनीतिक’ शब्द को परिभाषित कर रही है. अधिसूचना को लेकर साल 2020 के मसौदे के मुताबिक ऐसी परियोजनाओं के बारे में कोई भी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाएगी, जो इस श्रेणी में आती हैं. इसका खतरा ये है कि अब कई सारी परियोजनाओं के लिए रास्ता खुल जाएगा. उद्योग ऐसी परियोजनाओं को ‘रणनीतिक’ बताकर आसानी से मंजूरी ले लेंगे और उन्हें इसकी वजह भी बताने की जरूरत नहीं पड़ेगी.


इसके अलावा नई अधिसूचना विभिन्न परियोजनाओं की एक बहुत लंबी सूची पेश करती है जिसे जनता के साथ विचार-विमर्श के दायरे से बाहर रखा गया है. उदाहरण के तौर पर देश की सीमा पर स्थित क्षेत्रों में रोड या पाइपलाइन जैसी परियोजनाओं के लिए सार्वजनिक सुनवाई (पब्लिक हीयरिंग) की जरूरत नहीं होगी.


विभिन्न देशों की सीमा से 100 किमी. की हवाई दूरी वाले क्षेत्र को ‘बॉर्डर क्षेत्र’ के रूप में परिभाषित किया गया है. इसके कारण उत्तर-पूर्व का अच्छा खासा क्षेत्र इस परिभाषा के दायरे में आ जाएगा, जहां पर देश की सबसे घनी जैव विविधता है.


इसके अलावा सभी अंतरदेशीय जलमार्ग परियोजनाओं और राष्ट्रीय राजमार्गों के चौड़ीकरण को ईआईए अधिसूचना के तहत मंजूरी लेने के दायरे से बाहर रखा गया है. इन दोनों परियोजनाओं को केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी द्वारा काफी बढ़ावा दिया गया है. इसमें उन सड़कों को भी शामिल किया गया है जो जंगलों और नदियों से गुजरती हैं. खास बात ये है कि ये परियोजनाएं अभी भी सवालों के घेरे में हैं




EIA,2020 में किसे छूट है?


1. सभी अंतर्देशीय जलमार्ग परियोजनाओं और राष्ट्रीय राजमार्गों के विस्तार/चौड़ीकरण जो सरकार द्वारा मुख्य रूप से केंद्रित क्षेत्र हैं, इन संबंधित क्षेत्रों को पूर्व अनुमति प्रदान किये जाने से छूट दी जाएगी। इनमें वे सड़कें शामिल हैं जो जंगलों से गुजरती हैं और प्रमुख नदियों को विभाजित करती हैं.


2. वर्ष 2020 के मसौदे में 1,50,000 वर्ग मीटर क्षेत्र में निर्मित अधिकांश भवन निर्माण परियोजनाओं को भी छूट दी गई है. यह पर्यावरण मंत्रालय के दिसंबर 2016 की अधिसूचना का पुनर्मूल्यांकन है जिसे दिसंबर 2017 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा अस्वीकार किया गया था.



EIA,2020 में दो बड़े परिवर्तन :-


नए मसौदे में दो सबसे महत्वपूर्ण बदलाव "कार्योत्तर परियोजना की मंज़ूरी" और "जन विश्वास के सिद्धांत को छोड़ने" के प्रावधान हैं.


1. वस्तुत: ईआईए अधिसूचना, 2020 ने एक सबसे चिंताजनक और पर्यावरण विरोधी प्रावधान ये शामिल किया गया है कि अब उन कंपनियों या उद्योगों को भी क्लीयरेंस प्राप्त करने का मौका दिया जाएगा जो इससे पहले पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करती आ रही हैं. इसे ‘पोस्ट-फैक्टो प्रोजेक्ट क्लीयरेंस’ कहते हैं. इससे पहले मोदी सरकार मार्च 2017 में भी इस तरह की मंजूरी देने के लिए अधिसूचना लेकर आई थी और उसी को यहां दोहराया जा रहा है. प्रावधानों के मुताबिक ईआईए अधिसूचना लागू होने के बाद यदि किसी कंपनी ने पर्यावरण मंजूरी नहीं ली है तो वो 2,000-10,000 रुपये प्रतिदिन के आधार पर फाइन जमा कर के मंजूरी ले सकती है. अब जरा इस मामूली फाइन की तुलना प्रतिदिन उल्लंघन करने वाले किसी केमिकल उद्योग या कोयला खनन या अवैध बालू खनन से कीजिए. एक दिन में एक ट्रक अवैध कोयला या बालू की कीमत क्या होगी और सरकार एक दिन का कितना हर्जाना वसूल रही है. खास बात ये है कि सर्वोच्च न्यायालय ने पर्यावरण के मामलों में इस तरह के प्रावधान को पहले ही खारिज कर दिया है. एक अप्रैल को अपने एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ‘पोस्ट फैक्टो पर्यावरण मंजूरी’ कानून के खिलाफ है. पीठ ने कहा था कि यह एहतियाती सिद्धांत के साथ-साथ सतत विकास की आवश्यकता के भी खिलाफ है. पर्यावरण अधिनियम का उल्लंघन करने वाली परियोजनाएँ भी अब मंज़ूरी के लिये आवेदन कर सकेंगी. यह बिना मंज़ूरी के संचालित होने वाली परियोजनाओं के लिये मार्च, 2017 की अधिसूचना का पुनर्मूल्यांकन है.


2. वर्ष 2020 के मसौदे में ये कहा गया है कि सरकार इस तरह के पर्यावरणीय उल्लंघनों का संज्ञान लेगी. हालांकि ऐसे पर्यावरणीय उल्लंघन या तो सरकार या फिर खुद कंपनी द्वारा ही रिपोर्ट किए जा सकते हैं. यहां पर जनता द्वारा किसी भी उल्लंघन की शिकायत करने का कोई विकल्प नहीं है. ये अपने आप में कितना हास्यास्पद है कि सरकार उम्मीद कर रही है कि पर्यावरण का उल्लंघन करने वाली कंपनी खुद सरकार को ये बताएगी कि वो उल्लंघन कर रही है या कानून तोड़ रही है.



अंतत: यह कहा जा सकता है कि विवादित पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2020 के ज़रिये व्यापार सुगमता के नाम पर मोदी सरकार पर्यावरण को गंभीर ख़तरा पहुंचाने का रास्ता खोल रही है और हमेशा से ही पर्यावरण को बचाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नागरिकों को ही फ़ैसला लेने के अधिकार से बाहर कर रही है.



(यह लेख दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र और Climate Activist राहुल मीणा ने लिखा है.)


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