• Arjun Mehar

41 कोयला खदानों में खनन की प्रक्रिया शुरू होने से आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन खतरे में है

Updated: Jun 27, 2020

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को 41 कोयला खदानों के वाणिज्यिक खनन की प्रक्रिया शुरू कर दी. सरकार के इस कदम से देश का कोयला क्षेत्र निजी कंपनियों के लिए खुल जाएगा लेकिन इस प्रक्रिया के शुरू होने से आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन पर खतरा मंडरा रहा है. इसीलिए मोदी सरकार के इस कदम का देश के विभिन्न हिस्सों में का विरोध हो रहा है.


छत्तीसगढ़ में हसदेव अरण्य क्षेत्र के नौ सरपंचों ने नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कोयला खदानों की नीलामी पर गहरी चिंता जाहिर की है और कहा - "यहां का समुदाय पूर्णतया जंगल पर आश्रित है, जिसके विनाश से यहां के लोगों का पूरा अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा. सरकार का यह कदम आदिवासियों और वन में रहने वाले समुदायों की आजीविका, जीवनशैली और संस्कृति पर हमला है."

पिछले वर्ष 14 अक्टूबर से छत्तीसगढ़ राज्य के सरगुजा, सूरजपुर और कोरबा ज़िले के बीस से ज़्यादा गांवों के आदिवासियों ने हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोयला खदान खोले जाने के ख़िलाफ़ अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया था. ये लोग सरकार के खिलाफ इसलिए धरना दे रहे थे क्योंकि कोल ब्लॉक के लिए पेसा क़ानून और पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों की अनदेखी की गई.

खनन प्रभावित क्षेत्रों में कोयला खदानों का विरोध शुरू हो गया है. कोयला ब्लॉक नीलामी के खिलाफ प्रदर्शन करने पर धनबाद में 50 ट्रेड यूनियन नेताओं के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की गयी है.

एक तरफ भारत में कोयला खदानों में खनन का विरोध करने पर आंदोलनकारियों पर FIR दर्ज होती है तो दूसरी तरफ ऑस्ट्रेलिया में एक आदिवासी समूह (एबोरिजनल) ने पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया राज्य सरकार के ख़िलाफ़ खनन और अन्य गतिविधियों के लिए भूमि के नुकसान को लेकर मामले दर्ज किया है. क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में इस तरह का कदम सम्भव है? मेरी नजर में बिलकुल नहीं क्योंकि भारत में आदिवासी यदि खुद की आवाज खुद उठाते है तो उन्हें नक्सली करार दिया जाता है और शहरों में रहने वाले लोग यदि आदिवासियों की आवाज बुलंद करते है तो उन्हें अर्बन नक्सल करार दिया जाता है. यही इस दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की कड़वी सच्चाई है.


कोल ब्लॉक की नीलामी चिंता जताते हुये पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने भी ट्विटर पर ट्वीट करते हुए एक पत्र पोस्ट किया है. जयराम रमेश ने अपने पत्र में लिखा है कि अति संपन्न जैव विविधता वाले क्षेत्र के कोल ब्लॉकों को जिस प्रकार नीलामी के लिये प्रस्तुत किया गया, वह सदमे में डालने वाला फैसला है.

आदिवासी समुदाय के लोग और पर्यावरण हितैषी लोग आखिर इन कोयला खदानों में होने वाले वाले खनन का विरोध क्यों कर रहे है?

  1. कोल ब्लॉक के लिए पेसा क़ानून 1996, वन अधिकार मान्यता कानून 2006, भूमि अधिग्रहण कानून 2013 जैसे तमाम कानूनों और पांचवीं अनुसूची जैसे संवैधानिक प्रावधानों की धज्जियां उड़ाते हुए कोल बेयरिंग एक्ट 1957 और कोयला खदान विशेष प्रावधान अधिनियम दिसंबर 2014 का उपयोग किया जा रहा है.

  2. कोयला खदानों में होने वाले वाले खनन से जल, जंगल और जमीन खतरे में है क्योंकि खनन शुरू होने से आदिवासियों को उनकी जमीनों से बेदखल करके विस्थापित किया जायेगा, हसदेव अरण्य क्षेत्र के जंगलों को उजाड़ा जाएगा और साथ में हसदेव बांगो बांध एवं शारदा नदी जैसे जल स्त्रोतों पर भी खतरा मंडराएगा.

  3. सरकार का यह कदम आदिवासियों और वन में रहने वाले समुदायों की आजीविका, जीवनशैली और संस्कृति पर हमला है. क्योंकि जिन वन क्षेत्रों में कोयला खदानों में खनन की अनुमति दी गयी है, वहां के आदिवासियों को इन जंगलों से पुटु-खुखड़ी (प्राकृतिक जंगली मशरूम), तेंदूपत्ता, सालबीज, चिरौंजी, महुआ तथा जरूरत की अन्य चीजें प्राप्त होती हैं, जिस पर इनकी परंपरागत आजीविका निर्भर है. इन जंगलों में दुर्लभ प्रजाति की औषधीय वनस्पतियां प्राकृतिक रूप से पाई जाती हैं, जिससे स्थानीय निवासी अपना उपचार करते हैं. स्पष्ट है कि इन क्षेत्रों के आदिवासी जंगलों पर ही निर्भर हैं, यदि कोयला खदानों में खनन के नाम पर जंगलों को उजाड़ा गया तो उससे सबसे ज्यादा प्रभावित ये आदिवासी ही होंगे. आप "सिगरौली फाइल्स" के लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता अविनाश चंचल का यह ट्वीट देखेंगे तो वास्तविकता से रूबरू होंगे.

4. कई कोयला खदानें हाथी-पर्यावास क्षेत्रों में स्थित है फलत: हाथी-मानव संघर्ष में बढ़ोतरी होगी. पिछले 10 दिनों में छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग में छह हाथियों की मौत हो चुकी है. वहीं केंद्र सरकार ने लेमरू एलीफेंट प्रोजेक्ट क्षेत्र के चार कोल ब्लॉक को नीलामी के लिए प्रस्तावित कर हाथियों पर और संकट पैदा कर दिया है. इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में हाथी प्रवास करते हैं. अगर हाथियों को उनके इलाके से एक बार फिर से बेदखल किया जाता है तो हाथी-मानव द्वंद्व बढ़ना तय है.

5. कोयला खदानों में खनन के लिए सघन जंगलों को उजाड़ा जाएगा फलत: गंभीर पर्यावरणीय खतरा उत्पन्न होने की भी सम्भावना है और साथ में जैव विविधता पर भी असर पड़ेगा.

6. कोयला खदानों में खनन की इस तरह से अनुमति देना और इस क्षेत्र में निजीकरण करने का निर्णय 2014 में उच्चतम न्यायालय के द्वारा कोलगेट मामलें में दिए गए निर्णय की मूल भावना के भी खिलाफ है. उस आदेश की मूल भावना यह थी कि कोयला राष्ट्रीय संपदा है. किसी कल-कारखाने में बनने वाला कोई माल नहीं है बल्कि प्राकृतिक संसाधन है. जिसे बनने में सदियां लगती हैं. यह सीमित में मात्रा में होता है. इसलिए इसका इस्तेमाल जनहित में देश की जरूरतों के लिए ही किया जाना चाहिए और वहीं पर किये जाने की ज़रूरत है, जहां इसकी सबसे अधिक जरूरत हो.

7. कोयला खदानों में खनन की यह प्रक्रिया पेरिस समझौते के तहत भारत की प्रतिबद्धता के भी खिलाफ है.

8. कोयला खदानों में खनन की वजह से प्रदूषण में भी बढ़ोतरी होगी. आप अविनाश चंचल जी द्वारा किया गया यह ट्वीट जरूर देखिये आप को महसूस होगा कि खनन से कितना प्रदूषण होता है.

मोदी सरकार द्वारा लिए गए कोयला खदानों की नीलामी के ख़िलाफ़ झारखंड सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गयी है. यही कदम अन्य राज्य सरकारों को उठाना चाहिए खासकर छत्तीसगढ़ सरकार को आगे आना चाहिए क्योकि इस देश में 21% कोयला खनन सिर्फ छत्तीसगढ़ में होता है.

मोदी सरकार को यह बात सोचनी चाहिए कि देश की समृद्ध वन संपदा, असंख्य जीव जंतुओं, पर्यावरण और आदिवासियों को बचाने के लिए कुछ लाख टन कोयला नहीं निकाला जाएगा तो क्या देश का विकास रुक जाएगा? वास्तविकता यह है कि मोदी सरकार के लिए विकास तो सिर्फ जुमला है, असली मकसद तो कॉरपोरेट जगत के अपने अडानी - अम्बानी जैसे पूंजीपति दोस्तों का विकास करना है; चाहे इसके लिए आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन का विनाश करना पड़े. मोदी सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी संवैधानिक प्रावधानों और कानूनों में में कोई आस्था नहीं है, ना ही पर्यावरण संरक्षण से कोई लेना देना है और ना ही आदिवासियों की कोई फ़िक्र है; उन्हें फ़िक्र है तो सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने पूँजीपति दोस्तों की.



(अर्जुन महर दिल्ली विश्वविद्यालय में लॉ के स्टूडेंट है और वामपंथी छात्र संगठन AISA से जुड़े हुए है. साथ में दो किताबें भी लिख चुके है)


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