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कश्मीर - एक अनसुलझी कहानी


हरिसिंह कश्मीर को एशिया का स्विट्जरलैंड बनाना चाहते थे। जब पाकिस्तान के आक्रान्ता कबायली अंदर तक घुस आए, तो विलय स्वीकारा. कबाईलियों को भारतीय फौजो ने जब धकेलना शुरू किया तो कश्मीरियों की जान में जान आयी। श्रीनगर की सड़को पर सीटियाँ बजाकर, तिरंगा लहराकर हिन्दुस्तान की फौजों का स्वागत किया गया।

हिंदुस्तान में उनके लिए इज्ज़त के साथ जीने की गारंटी थी. हमने भी उनकी कश्मीरियत को सम्मान देने के लिए अपने संविधान में एक बाकायदा अनुच्छेद जोड़ा. सीमाएं, संचार, विदेश हमारा.. बाकी आप स्वतंत्र हो. उधर पाकिस्तान ने भी पीओके को सेमी अटोनोमस स्टेटस, अलग संसद, सुप्रीम कोर्ट और प्रधानमंत्री दिया। आज भी वहां के कश्मीर का अपना सदरे रियासत और प्राइमिनिस्टर है। नाम दिया- आज़ाद कश्मीर

हम कश्मीर को दिए वादे एक एक कर निरस्त करते रहे. कुल 96 सुविधाओं 92 पहले ही ख़त्म हो चुके थे. निरुपयोगी प्रावधान छोड़ दिए गये. फिर भी कश्मीर खुशनुमा बना रहा. देश भी एक आदत होता है, आप रोज रोज उसे नहीं बदलते. कश्मीरी खोखले 370 को पहचान बनाकर, उसे याद करते –भूलते... अब भी हमारे साथ मजे में था.

मगर 1987 की चुनावी धांधली ने हमारी राजनैतिक प्रणाली से आम कश्मीरी का विश्वास उठा दिया। चुनाव जीते हुए फारुख के विरोधी, काउंटिंग में हरा दिए गये. चुनाव आयोग देखता रहा. जायदातर विरोधी जेलों में डाले गये. राज्यपाल जगमोहन देखते रहे. जो बचे वो खीझ में अलगाव को हवा देने लगे. प्रदर्शन, रैली रोजमर्रा की चीजें हो गयी. पाकिस्तान से हथियार, इस्लाम और आतंकी आयात होने लगे. 1989-90 में रुबिया कांड, सेना के सर्च आपरेशन, गाव-कादल फायरिंग, मीरवाइज की हत्या और उनकी शवयात्रा पर जगमोहन की फायरिंग ने कश्मीर को मौत की ढलान पर धकेल दिया. कश्मीरी पंडितों के पलायन ने पूरे मामले को हिन्दू मुस्लिम कॉन्फ्लिक्ट की सूरत दे दी।

एक अवसर फिर आया जब मुफ़्ती मुहम्मद सईद और गुलाम नबी की सरकारें जमीन पर काम करती दिखीं। पर कश्मीर की बदकिस्मती का दौर अभी बचा है। सरकार बदली, उमर अब्दुल्ला और महबूबा बारी बारी नाकाम रहे। दिल्ली पर भगवा बादल छा गये और देश हिन्दू मुस्लिम विमर्श में डूब गया। इस माहौल में 370 के मरे बच्चे को उसकी माँ से खींचना राष्ट्रीय पैशन हो गया. आखिरकार आज हमने उन्हें दी हुई संवेधानिक और सॉवरिन गारन्टी को धता बताकर चप्पे चप्पे में फ़ौज भर दी है। जिस हिंदुस्तान की फौजो का कभी उन्होंने स्वागत किया था, आज आक्रान्ता की तरह देख रहे हैं.

मगर जरा ठीक से देखिए। 1948 में हमारी फ़ौज का स्वागत दरअसल दिल्ली का स्वागत था, फ़ौज का नही। उन्हें दिल्ली पर भरोसा था। आज उछाले जा रहे पत्थर भी फ़ौज पर नही, दिल्ली की सियासत पर हैं। वो सियासत, और वो दिल्ली जो अपनी जुबान पर कायम नहीं रही। अब इतिहास में लिखा जा चुका है कि हम वो देश है, जो किसी को दी गयी सोवरिन गारंटी की सौवनिटी कुछ भी नहीं है. नेताओ के चंद दिनों की सत्ता के लिए किये गये तमाशों पर पीढियां कुर्बान हो रही है. हम इन तमाशों की बलैया ले रहे हैं.

अजीब सा सेडिस्ट प्लेजर है. आपने एक इंच जमीन हासिल नहीं की. आज भी पाकिस्तान और चीन आधे से ज्यादा हिस्सा दबाये बैठे हैं. चीन आपकी सीमा में टहलता आ जाता है. आपने एक चूं नही की. बस जो सत्तर साल से आपका था, उसे कुचल कुचल कर आनंदित हैं.

क़बायली यदि चाहते तो श्रीनगर भी कब्जा कर सकते थे। मगर उन्होंने लूट और बलात्कार में समय गंवा दिया। आज हम कश्मीर की जमीनों की लूट के मंसूबे बांध रहे हैं. कश्मीरी लड़कियों के फोटो लगा रहे है, ताकि हमारे दोस्त अपने लिए छांट सकें।

बेटी और बोटी के लिए लार टपकाते आज हम भी वही क़बायली हो गए हैं जनाब... और ख्वाहिशमंद है किे आपसे प्यार किया जाये...! Courtesy:- Manish Singh

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